मौका लेक्चरर बनने का
मंगलवार, 23 फरवरी 2010 17:37

आपका सपना कॉलेज में लेक्चरर या रीडर बनने का है, तो आपके पास एक अच्छा मौका है, लेकिन इसके लिए आपको यूजीसी या सीएसआईआर द्वारा आयोजित परीक्षा पास करना होगा। हाल ही में लेक्चररशिप पद की पात्रता प्राप्त करने के लिए सीएसआईआर यानी कि काउंसिल ऑफ साइंटिफिक ऐंड इंडस्ट्रियल रिसर्च ने साइंस स्ट्रीम के स्टूडेंटस के लिए आवेदन आमंत्रित किए हैं। आवेदन करने की अंतिम तिथि 17 मार्च, 2010 है। परीक्षा 20 जून, 2010 को होगी।

 
क्या है प्रोसेस

 


जो साइंस के स्टूडेंट्स इस परीक्षा में सबसे अधिक अंक लाते हैं, उनकी मैरिट लिस्ट बनाई जाती है और इनमें से कुछ को जूनियर रिसर्च फेलोशिप यानी जेआरएफ और शेष को नेट यानी नेशनल एलिजिबिलिटी टेस्ट के लिए चुना जाता है। जेआरएफ में चुने गए स्टूडेंट्स को रिसर्च के लिए स्कॉलरशिप दिए जाते हैं, जबकि नेट क्वालीफाई को स्कॉलरशिप नहीं दिए जाते हैं। इस परीक्षा को उत्तीर्ण करनेवाले स्टूडेंटस ही लेक्चरर या रीडर पद के योग्य होते हैं। इसकी परीक्षा वर्ष में दो बार होती है।    

शैक्षिक योग्यता


सामान्य अभ्यर्थियों के लिए संबंधित विषय में कम से कम 55 प्रतिशत अंकों के साथ किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय या संस्थान से साइंस विषयों में स्नातकोत्तर अनिवार्य है। एससी, एसटी तथा समाज के विकलांग व्यक्तियों के लिए 50 प्रतिशत अंकों से स्नातकोत्तर होना जरूरी है।

उम्र सीमा


एलएस यानी कि लैक्चरर पद की पात्रता प्राप्त करने की चाह रखने वाले अभ्यर्थियों के लिए उम्र सीमा का कोई बंधन नहीं है, वहीं जेआरएफ के लिए उम्र सीमा सामान्य उम्मीदवारों के लिए न्यूनतम 19 और अधिकतम 28 वर्ष है, जबकि एससी, एसटी तथा विकलांग व्यक्तियों को अधिकतम उम्र सीमा में पांच वर्ष की छूट का प्रावधान है।
 
परीक्षा का स्वरूप


चार सौ अंकों की लिखित परीक्षा दो चरणों में होगी। इसमें दो प्रश्नपत्र होंगे। दोनों पेपर दो-दो सौ अंकों के होंगे। प्रत्येक पेपर के लिए ढाई घंटे निर्धारित किए गए हैं। जो अभ्यर्थी प्रथम प्रश्नपत्र में सीएसआईआर द्वारा निर्धारित न्यूनतम अर्हक अंक लाने में सफल होंगे, उन्हीं अभ्यर्थियों के दूसरे पेपर का मूल्यांकन किया जाएगा।    

स्मार्ट प्लानिंग जरूरी


इसके लिए आप एक योजना बनाएं और उसी के अनुरूप तैयारी को अंतिम रूप दें। प्रथम चरण के पेपर ऑब्जेक्टिव टाइप के होते हैं। इसके अंतर्गत सौ प्रश्न पूछे जाते हैं, जिसमें लगभग 25 प्रश्न जेनरल साइंस, मैथ, अर्थ साइंसेज ऐंड कंप्यूटर से संबंधित होते हैं। इसकी तैयारी के लिए एनसीईआरटी की ग्यारहवीं और बारहवीं के साइंस पुस्तकों का गहन अध्ययन करें।


विशेषज्ञों के अनुसार, यदि आप बेहतर तैयारी करते हैं, तो इसमें से बीस प्रश्न आसानी से बना लेंगे। अपनी विषय की तैयारी के लिए सबसे पहले महत्वपूर्ण अध्याय को एक जगह नोट कर लें। इस लिस्ट में उन्हीं को शामिल करें, जिससे हर वर्ष या सर्वाधिक प्रश्न पूछे जा रहे हैं। यदि चाहें, तो इस संबंध में सीनियर्स या कोचिंग की मदद ले सकते हैं। अक्सर देखा जाता है

कि स्टूडेंट्स प्रथम पेपर पर अधिक ध्यान नहीं देते हैं और अपनी सब्जेक्ट की तैयारी में ही लगे रहते हैंं। इसमें सफल होने के लिए दोनों पेपर की तैयारी के लिए समान समय दें। आप पिछले पांच वर्षों के प्रश्नपत्रों को लें और देखें कि किस तरह के प्रश्न पूछे जा रहे हैं। यदि टेक्नोसेवी हैं, तो कंप्यूटर से भी प्रश्नों को डाउनलोड कर सकते हैं। प्रश्नों के ट्रेंड को समझने का यह सबसे बेहतर तरीका है।

कैसे करें तैयारी


जहां तक सब्जेक्ट का सवाल है, तो यह स्नातकोत्तर स्तर का होता है। इस कारण जिस विषय से आप एमएससी हैं, उसके सिलेबस और विषय की समझ तो आपको पहले से ही होगी। अब सिर्फ आपको इस परीक्षा को ध्यान में रखकर तैयारी करने की है। बेहतर स्ट्रेटेजी  यह होगा कि आप प्रामाणिक पुस्तकों का अध्ययन करें। उसके बाद संक्षिप्त नोट्स बनाएं और उसी को बार-बार पढ़ें। इस तरह की रणनीति अपनाने से फायदा यह होगा कि आप कम समय में बेहतर तैयारी कर पाएंगे और परीक्षा के समय बेहतर प्रदर्शन करेंगे। बाजार में इसके लिए नोट्स भी मिलते हैं।

 

यदि आप चाहें, तो इसकी भी सहायता ले सकते हैं। वैसे यदि प्रामाणिक पुस्तकों का अध्ययन करते है, तो आप बेहतर उत्तर लिखने में सफल होंगे। परीक्षा हॉल में टू दी प्वाइंट उत्तर लिखने के लिए आप जिस प्रश्न का उत्तर देना चाहते हैं, उसका सबसे पहले एक रफ कॉपी में यह लिख लें कि मुझे इन्हीं प्वाइंटों के भीतर प्रश्नों का उत्तर देना है। इससे आप भटकाव से बच जाएंगे।


ऑब्जेक्टिव टाइप के प्रश्नों में अभ्यर्थियों के समक्ष तीन तरह के प्रश्न रहते हैं। पहला-आसान, दूसरा-50-50 और तीसरा लकी। विशेषज्ञों के अनुसार प्राय: सभी परीक्षाओं में निगेटिव मार्किंग का प्रावधान होता है। इस कारण दो विकल्प को अपनाना तो कारगर हो सकता है, लेकिन तीसरे विकल्प को अपनाना घातक होता है।

 

रेड वायर सिंड्रोम से ग्रस्त स्टूडेंट्स तीसरे विकल्प का ारपूर इस्तेमाल करते हैं। इस तरह के स्टडेंट्स की यही सोच होती है कि स ाी प्रश्नों को बनाकर ही सेलेक्शन पक्की की जा सकती है, जबकि वास्तविक स्थिति इसके उलट है। इस तरह की परीक्षा में सफल होने के लिए जरूरी है कि रेड वायर सिंड्रोम से बचें और दो विकल्पों का ही उपयोग करें। यदि आप इस परीक्षा और सिलेबस के बारे में विस्तृत रूप से जानना चाहते हैं, तो वेबसाइट WWW.csirhrdg.res.in देख सकते हैं।