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ललित सिन्हा का करियर बिल्कुल सही टै्रक पर हैं। पहले वे ओबीसी बैंक में प्रोबेशनरी ऑफिसर थे। जब इस करियर की शुरुआत की थी, तो उनका सपना बड़ा अधिकारी बनना ही था। जब यह पूरा हुआ, तो कुछ अलग करने की ख्वाहिश हुई। करियर से ब्रेक लेकर उन्होंने एमबीए किया। आज वे एक मल्टीनेशनल बैंक में कार्यरत हैं। यानी ऊंची ख्वाहिश, ऊंचे पद और ऊंची सैलॅरी सब कुछ हासिल हो गया। ललित ही नहीं, ऐसे प्रोफेशनल्स की संख्या लगातार बढ़ रही है। इनके सपने बड़े हैं और कुछ करने का जुनून उससे भी बड़ा।
बदला ट्रेंड, बदले मिजाजकॉर्पोरेट वल्र्ड तेजी से बदल रहा है। नई सोच और मल्टीस्किल्ड एम्प्लॉइज को ही तरजीह मिल रही है। इसे वर्किंग प्रोफेशनल्स भी बखूबी समझ रहे हैं। तभी पश्चिमी मुल्कों के तर्ज पर यहां भी वर्किंग प्रोफेशनल्स अध्ययन की ओर लौटने का एक नया ट्रेंड देखा जा रहा है। देश के छोटे-बड़े संस्थानों में ही नहीं, आईआईएम में वर्किंग प्रोफेशनल्स की दाखिला लेने की संख्या लगातार बढ़ रही है। आईआईएम कोलकाता के 2009 बैच का लगभग 63 फीसदी हिस्सा इंडिया इंक के लिए काम कर चुका है। पिछले साल ऐसे छात्र केवल 57 फीसदी थे। दिलचस्प बात यह है कि मौजूदा बैच के 20 से ज्यादा छात्र अपने-अपने कंपनियों से 20 लाख से ज्यादा सालाना पैकेज ले रहे हैं, लेकिन आईआईएम में दाखिला के लिए उन्हें इसे नजरअंदाज करने में कोई परेशानी नहीं हुई। इसी तरह, आईआईएम लखनऊ में अनुभवी छात्रों की तादाद ज्यादा है। वहीं आईआईएम बेंग्लुरु में 354 छात्रों के बैच में करीब 68 प्रतिशत छात्रों को तीन वर्ष से ज्यादा काम का अनुभव है और 31 प्रतिशत के अनुभव की मियाद चार साल से भी ज्यादा है। वर्ष 2009 में दाखिला लेने वाले बैच में से 68 फीसदी अनुभवी एग्जीक्यूटिव हैं। लब्बोलुआब यही है कि इसे आईआईएम में दाखिले का क्रेज भी कह सकते हैं, लेकिन इसका दूसरा पहलू भी एकदम स्पष्ट है। वह यह है कि वर्किंग प्रोफेशनल बेहतर करियर प्रॉस्पेक्ट्स के लिए जॉब छोडऩे से भी कोई गुरेज नहीं करते और आगे निकलने की उनकी प्यास बहुत बड़ी है।
बनना है रिफाइन्ड मैटीरियल
कोई भी प्रोडक्ट जितना रिफाइन्ड होगा, उसकी डिमांड उतनी ही बढ़ेगी। कुछ ऐसी ही राय रखती हैं, आईटी कंपनी कॉग्निजेंट की एम्प्लॉई डी.अर्चना। उनका कहना है, यदि आपको कुछ करना है, तो सपने पालने ही होंगे। लेकिन कोरे सपने से कुछ हासिल होता है क्या? इसलिए यह बेहद जरूरी है कि आप अपने नॉलेज को लगातार अपग्रेड करते रहें। यदि आप कोई कोर्स करते हैं या इनहाउस ट्रेनिंग करते हैं, तो इससे आपकी क्षमता में निखार आता है और आप पॉलिस्ड हो जाते हैं। ऐसे एम्प्लॉइज जाहिर है, औरों से अलग होते हैं और बेहतर जॉब पाने के योग्य भी।
रिस्क फैक्टर्स यहां भी
उन लोगों के लिए यह एक जोखिम भरा कदम बन सकता है, जो एक जॉब की सिक्योरिटी छोड़कर (फुल टाइम कोर्स के लिए) ड्रीम जॉब के लिए कोर्स करते हैं। हालांकि जानी मानी कंपनी हायर के एचआर हेड संदीप त्यागी कहते हैं, 'जोखिम से ही नए और कहीं बेहतर रास्ते खुलते हैं, सो आज के वर्किंग प्रोफेशनल्स इस बात को भी अच्छी तरह समझते हैं। हां, उन्हें इस बात का जरूर ध्यान रखना चाहिए कि उनके लिए क्या अच्छा है और वे कौन से कोर्स हैं, जिनसे उन्हें लाभ नहीं मिल सकता। जाहिर है अमुक स्पेशलाइजेशन आपके लिए है, इसकी पहचान जरूरी है।Ó
जरूरत स्मार्ट डिसिजन की
आज ज्यादातर लोगों में महज प्रोफाइल में डिग्रियां जोडऩे की प्रवृत्ति देखी जा सकती है। आईआईएम, लखनऊ के गेस्ट फैकल्टी निशांत सक्सेना के मुताबिक, डिग्रियां बटोरने की यह प्रवृत्ति निश्चित तौर पर फायदेमंद नहीं कही जा सकती। बेहतर होगा, ऐसे कैंडिडेट जॉब की जरूरतों को अच्छी तरह समझें और सही फैसला करें। वे आगे कहते हैं, अगर कोर्स आपके जॉब की डिमांड है, तो जरूर यह बात समझ में आती है।
मसलन, आपको लेक्चरर बनना है और इसके लिए पीएचडी करना जरूरी है, तो यह योग्यता आपको जुटानी ही होगी। इसी तरह, यदि आप फाइनेंस की फील्ड में हैं और किसी अच्छी कंपनी में जाना चाहते हैं, तो क्या ग्लोबल एमबीए प्रोग्राम आपको सूट करेगा? वहीं, आपका कम्युनिकेशन स्किल दुरुस्त नहीं है, तो इसे बेहतर करने के लिए स्पोकेन इंग्लिस या ऐसे कोई भी कोर्स आपकी सचमुच मदद कर सकते हंै? इसी तरह, अमुक साथी ने एमबीए इन सेल्स मार्केटिंग कर अच्छी नौकरी हासिल कर ली? क्या यही कोर्स आपको भी कर लेनी चाहिए? ऐसे चंद सवाल आपको सही निर्णय की तरफ ले जाएंगे और आप खुद को पाएंगे बिल्कुल राइट ट्रैक पर।
कुछ कोर्सेज आपके लिए
u पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन फाइनेंस (फाइनेंस या अकाउंटिंग से जुड़े प्रोफेशनल्स के लिए)
u एग्जीक्यूटिव पोस्ट ग्रेजुएट प्रोग्राम इन मैनेजमेंट रेसिडेंशियल (फुल टाइम) (सीनियर मैनेजमेंट प्रोफेशनल्स के लिए इस कोर्स में दाखिले के लिए पांच साल का वर्क-एक्सपीरियंस जरूरी है)
u ग्लोबल एमबीए प्रोग्राम (जर्मनी, इंडिया, यूएसए) (दो साल का एक्सपीरियंस और इंजीनियरिंग, कॉमर्स, बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में या साइंस में बैचलर डिग्री)
u पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन (इंजीनियरिंग, एमएससी, एमकॉम, एमसीए बैकग्राउंड के साथ दो साल का एक्सपीरियंस)
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